डीके शिवकुमार इस्तीफा कर्नाटक की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है जहां सीएम पद की दौड़ के बीच डीके शिवकुमार को झटका लगा है। एक मंत्री के इस्तीफे से राजनीतिक अस्थिरता बढ़ गई है और कांग्रेस में तनाव देखने को मिल रहा है।

कर्नाटक की राजनीति हमेशा से आश्चर्य और उथल-पुथल से भरी रही है। हाल ही में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में डीके शिवकुमार की जीत के साथ ही नई सरकार बनते-बनते पहला बड़ा झटका लग गया है। उपमुख्यमंत्री से मुख्यमंत्री बने डीके शिवकुमार की कैबिनेट शपथ ग्रहण के महज कुछ दिनों बाद वरिष्ठ कांग्रेस नेता और मंत्री रामलिंग रेड्डी ने पोर्टफोलियो आवंटन से नाराज़ होकर इस्तीफा दे दिया। यह घटना न केवल नई सरकार की स्थिरता पर सवाल उठा रही है, बल्कि कर्नाटक कांग्रेस के आंतरिक गुटबाजी और सत्ता के बंटवारे की पुरानी कहानी को फिर से ताज़ा कर रही है।
यह इस्तीफा सिद्धारमैया के इस्तीफे और डीके शिवकुमार के सीएम बनने की पृष्ठभूमि में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। आइए इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।
डीके शिवकुमार इस्तीफा: सिद्धारमैया का इस्तीफा और डीके शिवकुमार का उदय
मई 2026 के अंत में कर्नाटक राजनीति में बड़ा बदलाव आया। लंबे समय से चली आ रही सत्ता साझेदारी की अटकलों के बाद कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपना इस्तीफा दे दिया। 2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद बनी सत्ता साझेदारी के तहत यह बदलाव अपेक्षित था, लेकिन इसका समय और तरीका काफी चर्चित रहा।
डीके शिवकुमार, जो लंबे समय से उपमुख्यमंत्री के पद पर थे और संगठनात्मक क्षमता के लिए जाने जाते हैं, को कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद के लिए चुना। 3 जून 2026 को उन्होंने शपथ ली और एक संतुलित कैबिनेट का गठन किया, जिसमें विभिन्न जातियों, क्षेत्रों और गुटों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की कोशिश की गई। सिद्धारमैया ने खुद डीके शिवकुमार को आशीर्वाद देते हुए एक सौहार्दपूर्ण संक्रमण का संदेश दिया।
शिवकुमार ने शपथ लेते ही कल्याणकारी योजनाओं की निरंतरता, छात्रों के लिए मुफ्त बस पास जैसी घोषणाएं कीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं ने उन्हें बधाई दी। लेकिन नई शुरुआत में ही चुनौतियां सामने आने लगीं।
रामलिंग रेड्डी का इस्तीफा
नई कैबिनेट में रामलिंग रेड्डी को वॉटर रिसोर्सेज (जल संसाधन) विभाग दिया गया, जबकि उन्हें ग्रेटर बेंगलुरु डेवलपमेंट पोर्टफोलियो का वादा किया गया था, जो अंततः कृष्णा बायरे गौड़ा को मिल गया। रामलिंग रेड्डी, जो कांग्रेस में 53 साल से ज्यादा का अनुभव रखते हैं और बेंगलुरु से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं, इस फैसले से बेहद नाराज़ हुए।
उन्होंने इस्तीफा देते हुए स्पष्ट कहा कि “दो बार वादा किया गया था, मैं निराश हूं।” शपथ ग्रहण के महज दो-तीन दिन बाद यह इस्तीफा नई सरकार के लिए बड़ा झटका है। रामलिंग रेड्डी ने पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया है और विधायक के रूप में बने रहेंगे, लेकिन यह घटना कैबिनेट में असंतोष के बीज बो रही है।
यह विवाद दर्शाता है कि सीएम पद हासिल करने के बाद भी डीके शिवकुमार को अपने गुट को संभालना और विभिन्न दावेदारों के बीच संतुलन बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण होगा। रामलिंग रेड्डी जैसे अनुभवी नेता का असंतोष अन्य मंत्रियों और विधायकों को भी प्रभावित कर सकता है।
कर्नाटक कांग्रेस में गुटबाजी
कर्नाटक कांग्रेस लंबे समय से सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार गुट के बीच विभाजित रही है। सिद्धारमैया ओबीसी चेहरा हैं, जबकि शिवकुमार वाणिग समुदाय से आते हैं और मजबूत संगठनात्मक आधार रखते हैं। 2023 की जीत के बावजूद आंतरिक कलह कभी थमी नहीं।
डीके शिवकुमार की सीएम पद संभालने के साथ अब नई कैबिनेट में पोर्टफोलियो बंटवारे, डिप्टी सीएम पदों और भविष्य की रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज हैं। कुछ रिपोर्ट्स में 4 डिप्टी सीएम बनाने की बात भी कही जा रही है ताकि क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन बना रहे।
रामलिंग रेड्डी का इस्तीफा इस गुटबाजी को उजागर करता है। यदि इसे जल्द सुलझाया नहीं गया तो 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस की छवि को नुकसान पहुंच सकता है।
डीके शिवकुमार के सामने चुनौतियां
डीके शिवकुमार अनुभवी नेता हैं। उन्होंने पार्टी को कई संकटों से उबारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन अब उन्हें निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना होगा:
- कैबिनेट स्थिरता: रामलिंग रेड्डी जैसे नेताओं को मनाना और अन्य असंतुष्टों को संभालना।
- विकास कार्य: बेंगलुरु की ट्रैफिक, पानी और बुनियादी ढांचे की समस्याएं।
- विरोधी दलों का हमला: भाजपा इस आंतरिक कलह का फायदा उठाकर कांग्रेस पर हमला बोल रही है।
- सिद्धारमैया का प्रभाव: पूर्व सीएम सक्रिय राजनीति में बने रहने की घोषणा कर चुके हैं, जो नई सरकार के लिए दोनों तरफा तलवार साबित हो सकता है।
शिवकुमार को अपनी छवि को मजबूत संगठनकर्ता और विकास पुरुष के रूप में स्थापित करना होगा।
राजनीतिक विश्लेषण
कई विश्लेषकों का मानना है कि यह इस्तीफा शुरुआती दौर की अस्थिरता है, लेकिन अगर डीके शिवकुमार इसे कुशलतापूर्वक हैंडल करते हैं तो उनकी नेतृत्व क्षमता साबित हो जाएगी। दूसरी ओर, विपक्ष इसे कांग्रेस की “परिवारवादी” और “गुटबाज” छवि के रूप में प्रचारित कर रहा है।
कर्नाटक की राजनीति में जाति, क्षेत्र और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं हमेशा प्रमुख रहती हैं। डीके शिवकुमार को इन सभी को संतुलित करते हुए सरकार चलानी होगी।
निष्कर्ष
रामलिंग रेड्डी के इस्तीफे से कर्नाटक में सियासी हलचल तेज हो गई है। डीके शिवकुमार के लिए यह परीक्षा का समय है। यदि वे जल्द ही विवाद सुलझाते हैं और एक मजबूत टीम बनाते हैं, तो उनकी सरकार स्थिर रह सकती है। अन्यथा, आंतरिक कलह 2028 के चुनावों तक कांग्रेस को कमजोर कर सकती है।
कर्नाटक की जनता विकास और स्थिरता चाहती है। अब देखना होगा कि नई सरकार इन अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरती है। राजनीति की यह दौड़ जारी रहेगी, लेकिन आम आदमी के मुद्दे कहीं पीछे न छूट जाएं, यही सबसे बड़ी चुनौती है।






