उद्धव गुट संकट उद्धव ठाकरे गुट पर सियासी संकट गहराता नजर आ रहा है। कई सांसदों के पार्टी छोड़ने की अटकलों के बीच संगठन की मजबूती और भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं। जानिए राजनीतिक घटनाक्रम और इसके संभावित प्रभाव की पूरी जानकारी।

महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर से उबाल पर है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) यानी उद्धव गुट पर गहरा संकट मंडरा रहा है। हालिया खबरों और सूत्रों के हवाले से पता चल रहा है कि पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 5 से 7 सांसद एकनाथ शिंदे गुट की ओर रुख कर सकते हैं। इस घटनाक्रम को ‘ऑपरेशन टाइगर’ नाम दिया जा रहा है, जो 2022 की उस बड़ी बगावत की याद दिलाता है जिसने उद्धव ठाकरे की सरकार गिरा दी थी।
उद्धव गुट संकट: अनुपस्थित सांसद और इमरजेंसी बैठक
सभी की नजरें मातोश्री पर टिकी हुई थीं। उद्धव ठाकरे ने पार्टी की एकता को मजबूत करने के लिए अपनी 9 लोकसभा सांसदों की अहम बैठक बुलाई। लेकिन बैठक में सिर्फ 4 सांसद शारीरिक रूप से पहुंचे, जबकि बाकी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़े या पूरी तरह गायब रहे। सूत्रों के मुताबिक, पांच सांसदों – संजय जाधव, संजय देशमुख, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और नागेश पाटिल आश्टिकर – ने बैठक से दूरी बनाई।
उद्धव ठाकरे ने इन अनुपस्थित सांसदों को 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने को कहा। यह घटना महज एक बैठक की गैरमौजूदगी नहीं, बल्कि गहरी असंतोष और संभावित विद्रोह का संकेत मानी जा रही है। शिंदे गुट के नेता कृपाल तुमाने ने दावा किया कि सात सांसदों से बातचीत अंतिम चरण में है और वे जल्द ही शिंदे खेमे में शामिल हो सकते हैं।
2022 की बगावत की पुनरावृत्ति?
2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत ने शिवसेना को दो गुटों में बांट दिया। शिंदे गुट को चुनाव आयोग ने असली शिवसेना का नाम और चुनाव चिन्ह दिया, जबकि उद्धव गुट को ‘शिवसेना (यूबीटी)’ के रूप में अलग होना पड़ा। तब 39 विधायकों और 13 सांसदों के साथ शिंदे ने विद्रोह किया था।
अब 2026 में फिर उसी तरह की अटकलें जोर पकड़ रही हैं। सूत्र बताते हैं कि 14-16 विधायक और 6-7 सांसद उद्धव गुट छोड़ने की तैयारी में हैं। दिल्ली में हुई कुछ मुलाकातों का जिक्र भी हो रहा है, जहां शिंदे के संपर्क में सांसदों की बातचीत हुई। अगर यह टूट होती है तो उद्धव गुट की संसदीय ताकत बुरी तरह प्रभावित होगी। लोकसभा में वर्तमान स्थिति में उद्धव गुट के पास सीमित सांसद हैं, और उनकी कमी पार्टी की राष्ट्रीय उपस्थिति को और कमजोर कर देगी।
सांसदों के जाने के पीछे के कारण
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार कई फैक्टर इस संकट के जिम्मेदार हैं:
- संगठनात्मक कमजोरी: 2022 के बाद उद्धव गुट ने संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन शिंदे गुट की सत्ता का लाभ और विकास कार्यों का श्रेय लेने की रणनीति ने कई स्थानीय नेताओं को आकर्षित किया। नागपुर जैसे क्षेत्रों में हालिया विद्रोह इसके उदाहरण हैं।
- आंतरिक असंतोष: कुछ सांसदों में नेतृत्व शैली, खासकर आदित्य ठाकरे की भूमिका और फैसलों पर नाराजगी बताई जा रही है। बैठक में गैरमौजूदगी ने इन खामियों को उजागर किया।
- सत्ता का आकर्षण: शिंदे-फडणवीस सरकार में मंत्री पद, विकास परियोजनाएं और स्थानीय प्रभाव बढ़ाने के अवसर कई नेताओं को लुभा रहे हैं। ‘ऑपरेशन टाइगर’ को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
- विपक्षी गठबंधन की चुनौतियां: महाविकास अघाड़ी (MVA) में कांग्रेस और एनसीपी के साथ तालमेल बिठाने में उद्धव गुट को दिक्कतें आ रही हैं। हिंदुत्व की मूल विचारधारा से दूरी के आरोप भी लग रहे हैं।
संजय राउत जैसे नेताओं ने इन अटकलों को खारिज करते हुए इन्हें अफवाह और पैसे की सौदेबाजी बताया है। उन्होंने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर किसी भी टूट को रोकने की अपील की है।
पार्टी की ताकत पर उठते सवाल
यह संकट उद्धव ठाकरे गुट की मौजूदा ताकत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। 2024 के चुनावों के बाद पार्टी पहले ही संघर्ष कर रही है। अगर सांसद और विधायक जाते हैं तो:
- संसद में विपक्षी आवाज कमजोर होगी।
- महाराष्ट्र विधानसभा में MVA की स्थिति प्रभावित होगी।
- स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट सकता है।
- आगामी चुनावों में शिंदे गुट और महायुति का दबदबा बढ़ेगा।
उद्धव ठाकरे ने सांसदों से कहा है कि जो लोग बाल ठाकरे की विचारधारा छोड़कर गए, उन्हें पछतावा होगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि राजनीति में वफादारी और सत्ता का गणित अक्सर अलग चलता है।
भविष्य की संभावनाएं और चुनौतियां
अगर ‘ऑपरेशन टाइगर’ सफल होता है तो उद्धव गुट के सामने दो विकल्प होंगे – या तो कानूनी लड़ाई (एंटी-डिफेक्शन लॉ) या फिर नई रणनीति के साथ संगठन को पुनर्जीवित करना। राज ठाकरे की शिवसेना भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है, जो कभी-कभी टिप्पणियां करती रहती है।
दूसरी ओर, शिंदे गुट इस मौके को भुनाते हुए ‘असली शिवसैनिकों’ को वापस लाने का दावा कर रहा है। महाराष्ट्र की राजनीति में यह संकट सिर्फ एक पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे राज्य के सत्ता समीकरण को प्रभावित करेगा।
निष्कर्ष
शिवसेना बाल ठाकरे की विरासत है, जो मराठी अस्मिता, हिंदुत्व और सामाजिक न्याय पर टिकी हुई थी। बार-बार की टूटों ने इस विरासत को कमजोर किया है। उद्धव ठाकरे को अब फैसला करना होगा कि वे पार्टी को कैसे एकजुट रखें और कार्यकर्ताओं का विश्वास बहाल करें।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगले कुछ दिनों में बड़ा खुलासा हो सकता है। क्या उद्धव गुट टूटेगा या मजबूत होकर उभरेगा? समय बताएगा। लेकिन फिलहाल, संकट गहरा है और पार्टी की ताकत पर सवाल बरकरार हैं।
महाराष्ट्र की जनता इस पूरे घटनाक्रम को करीब से देख रही है। विकास, रोजगार और स्थिर सरकार के मुद्दों के बीच यह सियासी बाजी कितनी असरदार साबित होगी, यह आने वाला समय तय करेगा।





