कलकत्ता हाईकोर्ट : ने एक संवेदनशील रेप केस में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज बलात्कार का मामला रद्द कर दिया और कहा कि अगर दो वयस्क व्यक्ति लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहते हैं, होटलों में रातें गुजारते हैं और शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो यह आपसी सहमति का स्पष्ट संकेत है। शादी का वादा टूटने पर रिश्ता खराब होने को बलात्कार नहीं माना जा सकता। यह फैसला सोमवार को आया, जिसमें कोर्ट ने संबंध की प्रकृति पर गहराई से विचार किया।
कलकत्ता हाईकोर्ट केस की पूरी कहानी: 2017 से 2022 तक का रिश्ता
मामला 2017 में शुरू हुआ, जब आरोपी और महिला के बीच प्रेम संबंध बना। महिला ने आरोप लगाया कि 2018 में आरोपी ने उसे कुछ पिलाकर बलात्कार किया और शादी का वादा किया, जिस कारण वह चुप रही। दोनों ने कई ट्रिप्स कीं – दीघा, गोवा, पार्क स्ट्रीट और खड़गपुर में। इन दौरान उन्होंने विभिन्न होटलों में साथ रातें गुजारीं और पति-पत्नी जैसा व्यवहार किया।

2020 में महिला गर्भवती हुई। दोनों की सहमति से गर्भपात कराया गया, क्योंकि आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया। रिश्ते में कड़वाहट आने के बाद महिला ने 16 फरवरी 2022 को पश्चिम मिदनापुर पुलिस में शिकायत दर्ज की। आरोपी पर शादी का झांसा देकर बलात्कार और जबरन गर्भपात कराने का आरोप लगा। 23 फरवरी 2022 को उसे गिरफ्तार किया गया।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां!
- कलकत्ता हाईकोर्ट ने जांच के दौरान पाया कि रिश्ता 5 साल तक चला (2017 से 2022 तक)। कोर्ट ने कहा
- “रिश्ते के दौरान उन्होंने शारीरिक संबंध बनाए, कई होटलों में साथ रातें गुजारीं और पति-पत्नी की तरह रहे।
- यह व्यवहार साफ तौर पर आपसी सहमति दिखाता है, न कि धोखे या प्रलोभन से।
कोर्ट ने बलात्कार साबित करने के लिए जरूरी शर्त बताई: “शुरुआत से ही धोखा देने या गलत इरादा होना चाहिए, जिससे महिला यौन संबंध बनाने के लिए प्रेरित हुई हो।” यहां ऐसा कोई सबूत नहीं मिला। महिला ने 5-6 साल तक रिश्ता जारी रखा, कोई शिकायत नहीं की। कोर्ट ने कहा, “ऐसे में यह साफ नहीं होता कि महिला किसी गलतफहमी में थी।”
गर्भावस्था और गर्भपात भी दोनों की सहमति से हुआ, जो संबंध की सहमति को और मजबूत करता है। कोर्ट ने फैसला दिया कि यह सहमति से बने रिश्ते का मामला है, जो बाद में खराब हो गया। सिर्फ शादी न होने पर इसे बलात्कार नहीं कहा जा सकता।
कानूनी नजरिया: सहमति vs झूठा वादा
- भारतीय कानून में बलात्कार के लिए सहमति का अभाव जरूरी है। कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट
- और हाईकोर्ट्स ने स्पष्ट किया है कि अगर संबंध शुरू से सहमति पर आधारित हो और बाद
- में ब्रेकअप हो जाए, तो इसे रेप नहीं माना जाएगा। कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी यही सिद्धांत अपनाया।
- कोर्ट ने कहा, “सहमति से बने संबंध को आपराधिक बनाने से न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ पड़ता है
- और आरोपी की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचती है।”
समाज और कानून के लिए संदेश
- यह फैसला लाइव-इन रिलेशनशिप और प्रेम संबंधों में सहमति के महत्व को रेखांकित करता है।
- लंबे समय तक साथ रहना, यात्राएं करना और शारीरिक संबंध बनाना सहमति का प्रमाण माना जाता है।
- हालांकि, हर केस अपने तथ्यों पर निर्भर करता है। अगर शुरू से धोखा साबित हो, तो कानून सख्त है।
यह निर्णय उन मामलों में राहत देता है जहां रिश्ता वास्तव में सहमति पर आधारित था, लेकिन ब्रेकअप के बाद कानूनी दुरुपयोग हुआ। साथ ही, महिलाओं की सुरक्षा और सहमति के मुद्दे पर भी सोचने की जरूरत है।
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